आदेश त्यागी द्वारा रचित कविता “पानी”
“पानी”
धरा से जीवन लेकर तुम,
धरा को ही जीवन देते हो।
वाष्प बन निकल जाते घर से,
रूप मानसून धर लेते हो ।।
मुक्त गगन में विचरण करते,
आलिंगन से गिरि से हुआ तुम्हारा।
हर्ष मिलन का छलका नभ से,
बरसे तुम बनकर जल धारा ।।
नदियों में तुम जल बन जाते,
सौन्दर्य में बन जाते नीर।
देह से फूटे, बनते ‘स्वेद’,
अश्रु बन कह जाते पीर ।।
चेतन जग के जीवन पालक,
हे ‘वारि’! मैं वारि जाऊँ ।
कैसे करूँ महिमा का वर्णन,
भाव शब्द में कैसे लॉऊं ।
रचयिता-आदेश त्यागी



More Stories
महाविद्यालय अगरोड़ा में मतदाता जागरूकता की शपथ लेकर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की व्यक्त
स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति के प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम राज्यपाल ढाल सिंह बिसेन से कि भेंट
रानीखेत में भव्य रूप से मनाया उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस: सजी स्वरोजगार की अनूठी प्रदर्शनी