सुखवीर चौधरी की गज़ल “मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ”

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

प्यार बचपन से तुम्हें मैं कर रहा हूँ ,

आज ये तुमको बताना चाहता हूँ ।

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

बात मरने की है तो मर जाऊँगा पर ,

मौत से आँखें मिलाना चाहता हूँ ।

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

मैं नहीं भूला तुम्हें तो आज तक ,

बस यही तुम को बताना चाहता हूँ ।

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

तुम रही हो आज तक दिल में हमारे ,

बस यही नग़मा सुनाना चाहता हूँ ।

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

तुम मुझे ही यार सब कुछ मानती थी ,

याद वो दुनिया दिलाना चाहता हूँ

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ,

मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ ।

 

कौन ज़िन्दा है यहाँ सब को पता है ,

बोझ घर का मैं उठाना चाहता हूँ ।

 

मैं तुम्हें दिल में बसाना चाहता हूँ ।

 

ग़ज़ल रचयिता : कवि सुखवीर चौधरी

उपलब्धियाँः आप की रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, आपको अनेकों ऑनलाइन कवि सम्मेलनों में सम्मानित किया जा चुका है।

कवि सुखवीर चौधरी

मथुरा ( उत्तर प्रदेश )

Kavi Sukhveer Choughry