January 25, 2026

Naval Times News

निष्पक्ष कलम की निष्पक्ष आवाज

गणतंत्र दिवस पर अरविन्द सिसोदिया की कविता- “भारत के गणतंत्र में रामराज भर दो”

कोटा- गणतंत्र दिवस के अवसर पर अरविन्द सिसोदिया जी की कविता- “भारत के गणतंत्र में रामराज भर दो”

गणतंत्र तभी सम्मान का अधिकारी हो ,

जब उसमें रामराज्य जैसी भागीदारी हो ।

केवल सत्ता का उत्सव नहीं, यह विश्वास की गादी,

जन-जन की पीड़ा हरना सत्ता की जिम्मेदारी हो॥

काग़ज़ में समानता, व्यवहार में अंतर बड़ा भारी,

कहीं जाति, तो कहीं वर्गभेद, कहीं संप्रदाय की आरी।

संस्कार-विहीन चेतना, भ्रष्टाचार में दम तोड़ती लाचारी,

न्याय पूँजीवादी, कानूनी महँगाई की नियति अति न्यारी।

सत्ता में कुछ अच्छे हैं, पर सब नहीं—तंत्र सब पर भारी,

इसी से घिरा प्रश्नों का गणराज्य, लगता रोग और बीमारी।

छल, कपट और झूठ मारते नित-नित बाज़ी,

धर्म और पंथ तौले जाते मतों से, मानवता हर जगह हारी।

रामराज्य केवल अतीत की कथा नहीं था,

वह लोकधर्म और नीति का पथ-प्रबंधन था।

जहाँ राजा नहीं, सेवक होता था सिंहासन पर,

अंतिम व्यक्ति भी पाता था सम्मान अपनेपन का।

न भय था, न भेद था, न अन्याय का अंधकार,

धर्म था कर्म में, सत्य था शासन का आधार।

यदि वही चेतना लौटे आज के व्यवहार-विधान में,

स्वर्णिम हो भारत फिर से, संविधान के आसन में।

आओ संस्कार को शस्त्र बनाएँ, चरित्र का निर्माण करें,

कर्तव्य को संकल्प बनाकर, अधिकारों में ज्ञान भरें।

ईमान की अलख जगाएँ, स्वार्थ को मन से हटाएँ,

नैतिक बने नेतृत्व सारा, पवित्र प्रशासन बनाएँ।

भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की लत दूर भगाएँ,

समस्याओं के संघर्ष पहचानें, उनके हल प्रकटाएँ,

जनता के निर्वाचित मन को दृढ़ निश्चय से निश्चिंत करें,

जन-गण-मन को सुख, समृद्धि और संतोष से अभिसिंचित करें।

सुनो, व्यक्ति-निर्माण से राष्ट्र गढ़ने की तैयारी कर लो,

भारत के गणतंत्र में रामराज भर दो, रामराज भर दो।

About The Author

You may have missed