एनटीन्यूज़: अस्पताल में कोविड का मरीज तन-मन से टूट जाता है, लेकिन कोरोना पर हावी होते हुए डाॅ0 निशंक ने लिखा है कि मेरे असीम साहस, उम्मीदों और सकारात्मक चिंतन के आगे तुम्हारी एक न चल पाएगी। तुम्हें मैं परास्त करके रहूंगा।

तन-मन को बुरी तरह ’जख्मी’ कर देने वाले कोविड-19 को डाॅ0 निशंक ने साहस और सहजता के साथ परास्त किया है।

इस प्रकार सकारात्मक विचारों के साथ डाॅ0 निशंक ने कोरोना को परास्त कर उन लोगों को एक प्रेरक संदेश दिया है, जो इस बीमारी का नाम सुनने मात्र से सिहर जाते हैं।

डाॅ0 निशंक ने कविता के माध्यम से यह जतलाने का प्रयास किया है कि बीमारी से लड़ने के लिए मन में सकारात्मक विचारों का होना बहुत आवश्यक है।

कोरोना की विभीषिका से जूझते हुए, एम्स में रहते हुए डॉ “निशंक” ने “एक जंग लड़ते हुए” शीर्षक से जो कविताएँ लिखी हैं,उस संग्रह से एक कविता”कोरोना” मैं आप सबसे साझा कर रहा हूँ, जो उनके दृढ़ संकल्प के साथ ही उनकी जीवट और लोकचिन्तन का दर्पण भी है-

कोरोना

“हार कहाँ मानी है मैंने?
रार कहाँ ठानी है मैंने?
मैं तो अपने पथ-संघर्षों का
पालन करता आया हूँ।

क्यों आए तुम कोरोना मुझ तक ?
तुमको बैरंग ही जाना है।
पूछ सको तो पूछो मुझको,
मैंने मन में ठाना है।

तुम्हीं न जाने,
आए कैसे मुझमें ऐसे?
पर,मैं तुम पर भी छाया हूँ,
मैं तिल-तिल जल
मिटा तिमिर को
आशाओं को बोऊँगा;
नहीं आज तक सोया हूँ
अब कहाँ मैं सोऊँगा?

देखो, इस घनघोर तिमिर में
मैं जीवन-दीप जलाया हूँ।
तुम्हीं न जाने आए कैसे,
पर देखो, मैं तुम पर भी छाया हूँ।”

दिल्ली, एम्स कक्ष-704,प्रातः 7:00 बजे 6 मई, 2021

निस्संदेह, यह कविता नहीं है,बल्कि पूरी मानवता को अक्षर-साधक कवि- हृदय का जीवन-संदेश है।