जब हृदय की वेदना कलम का साथ लिए शब्दों के रूप में कागज पर उभरती हैं तो निश्चित रूप से एक कविता का रूप लेती हैं, ऐसा ही इस कविता के माध्यम से दीप्ति जैन द्वारा   समाज में व्याप्त, हृदय को झनझोडने वाली पीड़ा का बहुत ही मार्मिक हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया है, सोचने पर मजबूर करती हुई रचना…।

इस कविता को सुनने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://youtu.be/btXT7o8x6wg

 

दीप्ति जैन द्वारा रचित कविता:  ये,प्रयोजन के साथ होते षड्यंत्र….ये सडा हुआ तंत्र

मैं लिखू या ना लिखू…………

मैं लिखू या ना लिखू, दुविधा मे रहती हूँ
कितने दिन हुए यूं तो पर आज डरते हुए ही सही,

फिर भी कुछ कहती हूँ…

इस समाज की खामियाँ रोज़, नयी शक्ल मे दिख जाती है….
ये, प्रयोजन के साथ होते षड्यंत्र,
ये सडा हुआ तंत्र !!!

जब किसी नौ साल की बच्ची को सिखाया जाता है,
ना कर खिलाफत….
क्यों मोल ले आफत….
गलत किया उसने, स्पर्श अनुचित,
पर बेटा, मुँह खोल के भी ना होगा कुछ हित !
हो गया तो जाने दे, ना होगा अगली बार,
बोलते हुए मां की आँख से अश्रु धार !!

आँख से अश्रु धार !!
जाने क्या समझी ही होंगी बच्ची …
अगली बार….अगली बार शायद… फिर से हुआ हो
पिछली दफा मां को रोता देख, फिर उस से कुछ, कहा ही ना गया हो…

कुछ कहा ही ना गया हो…
सम्भावनाये बहुत है, सम्भावनाये ये बहुत है,
क्यूंकि ना बोलने मे ही तो हित है

मैं लिखना चाहती हूँ उनके बारे मे जिनका
छलनी होता गया, आत्म सम्मान
जब फिर उसको, उसको बताया गया,
ना कर खिलाफत….
क्यों मोल ले आफत….
फब्ती कसी उसने तो क्या हुआ,
उसने क्या छुआ ???
कुछ नहीं, इन लोगो का होता ही है ऐसा चरित्र
मुँह खोल के भी बिटिया, ना होगा कुछ हित….
हो ऐसा गर अगली बार
नज़र अंदाज़ कर,
पलट कर ना कभी कुछ बोल देना
बस दुसरे रास्ते से, जल्दी वापस हो लेना !!

बस दुसरे रास्ते से, जल्दी वापस हो लेना !!
फिर उसने माँ -बाबा से कभी कुछ बोला नहीं, सयानी हो गयी…
जान गई सब ये उसके लिए, ये रोज़ की कहानी हो गयी !

ध्यान दिया ना आपने??

ये सब प्रयोजन के साथ होते षड्यंत्र है ,
ये सडा हुआ तंत्र है

और लिखना चाहती हूँ उन अबलाओ के लिए जिनको
कोई लांछन या गाली दे,
फब्ती कसे या ताली दे,
वार करें, बलात्कार करें और चाहे हाथ उठाये….
पर रखना है सर झुकाये??
अगर शिकवा किया भी तो फिर वही संवाद,
वही वाद – वही विवाद

ना कर खिलाफत….
क्यों मोल ले आफत….
स्वाभिमान और गरिमा महज़ शब्द है कथित…
ये है ज्ञात और अपेक्षित,
कि मुँह खोल के भी ना होगा कुछ हित….

ये प्रयोजन के साथ होते षड्यंत्र,
ये सडा हुआ तंत्र….

ये सडा हुआ तंत्र….

ये सडा हुआ तंत्र….

(समझाया गया उसे और समझ गई वो, ये कि खुद के अस्तित्व, अस्मिता को बचाये रखने के लिए, चुप रहना ही है, सबसे बड़ा हथियार)

 

दीप्ति जैन