विश्व कविता दिवस पर डॉ० सुशील उपाध्याय की कलम से “अतीत के त्रिकोण में
पिता का कोट
खूंटी पर टंगा रहता है,
उसे वार्डरोब की आदत नहीं है!
बेतरतीबी से टंके बटन,
झोले-सी जेबें,
मोटा अस्तर
लटके हुए कॉलर
और
मटमैले रंग में
मैल को छिपाये
बहुत बेतरतीब सा है –
पिता का कोट।
……
मां देर तक निहारती रही थी
पहली बार कोट पहने हुए पिता को,
उनका रौब निखर आया था,
कई बार पहना
पहनकर निकाला,
करीने से तहाकर
मां को सौंप दिया-
‘संभालकर रखना कोट!’
……
बरसों तक संभालती रही मां,
बारिश के बाद धूप दिखाती
तहों में नीम की पत्तियां रखती
और
एक पैन ले आने के लिए
पिता से इसरार करती
ताकि कोट की जेब लगे
और भी गरिमापूर्ण।
…..
अब पिता कोट नहीं पहनते,
सिकुड़ी हुई देह के सामने
विराट हो गया है कोट।
झुके हुए कंधे नहीं संभाल पाते
अतीत का बोझ!
पैन की स्याही
जेब के नीचे तक रिस गई है,
अस्तर लटक गया घिसकर,
जेबें छोड़ चुकी हैं अपनी जगह,
फिर भी पिता का कोट
खूंटी पर टंगा रहता है,
जैसे
इतिहास की गवाही देते पिता
खुद टंगे हुए हैं
अतीत के त्रिकोण में!
वरिष्ठ पत्रकार डॉ० सुशील उपाध्याय


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