श्री भारतेन्दु समिति के संस्थापक स्व. हनुमान प्रसाद सक्सेना हाड़ौती के ऐसे सपूत थे, जिनका जन्म 15 फरवरी 1901 को क्रांतिकारी परिवार में हुआ था। उन्होंने यहाँ के राष्ट्रकर्मियों को क्या-क्या नहीं दिया।
भारत में अंग्रेजी राज्य था। देशी राज्यों में उसके कारण अधिक कुंठा व उत्पीड़न थी। एक ओर देश के कोने-कोने में राष्ट्रवादियों को जेल में बंद कर यातनाएं दी जा रही थी। वहीं दूसरी ओर मैकॉले की शिक्षा योजना ने माँ भारती की जीभ काट ली थी। सब ओर अंग्रेजों और अंग्रेजी का बोलबाला था। ऐसे समय हाड़ौती क्षेत्र में न केवल राज्याश्रय से किंतु स्वतः ही साहित्य व कला का उत्साह फूट पड़ा था। यहाँ निबंध लेखन, पत्रकारिता, नाट्य लेखन, चित्रकला एवं संगीत की विशिष्ट उपलब्धियाँ रही हैं।
इसी परिवेश में 18 फरवरी 1926 को श्री हनुमान प्रसाद सक्सेना ने अपने साथियों को साथ लेकर राष्ट्रसेवा का बीड़ा उठाया और मैकॉले के अंग्रेजीवाद के विरुद्ध ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल के महामंत्र के उद्घोष करने वाले महान देशभक्त भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाम पर राष्ट्रीय नाट्य मंच के रूप में साहित्य व संगीत को समर्पित श्री भारतेन्दु समिति की स्थापना की व इस मंच से अनेक राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व धार्मिक नाट्य विधाओं को चलाया। कितना जीवट था उनमें। उनमें रामभक्त हनुमान की निष्ठा व आस्था थी।
एक ओर समिति में व्याख्यान, काव्य-गोष्ठी, खेल-मुशायरा, कवि-दरबार व नाटक आयोजित होते वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाओं की तैयारी होती। श्री हनुमान प्रसाद घर-घर जाकर लोगों को हिन्दी साहित्य की परीक्षा के लिए प्रेरित करते। वे अध्ययनशील इतने थे कि पुस्तकालय में कोई पुस्तक ऐसी नहीं बची जिसे उन्होंने आद्योपांत न पढा हो।
उनका अपना ही रंग था। दोहरे शरीर का यह सौम्य व्यक्त्तित्व जिस पर नजर डालता उसे अपना कर लेता। लोगों को प्रेरणा देना ही उनका जीवन था। उन्होंने सम्मेलन का केंद्र खुलवाया जहाँ भारी संख्या में परीक्षार्थी आते थे, कभी-कभी देश के बड़े केन्द्रों से अधिक परीक्षार्थी बैठते थे। उनकी प्रिय वस्तु उनके कंधे पर समिति का झोला थी। वे इतने विनोदप्रिय थे कि उनकी मिस्टर की भैंस जो भी सुनता हंसे बिना नहीं रहता। कभी-कभी इतना सुरुचिपूर्ण व्यंग्य कर देते कि लोग आश्चर्य करते थे। ‘चल बे टट्टू घंटाघर को उनका बहुचर्चित व्यंग्य था जो उन्होंने सरकारी अफसर पर कसा था। वे जब नाट्य मंच पर झूम झूम कर हारमोनियम बजाते तो लोग आनंदित हो जाते थे।
1- श्री हनुमान प्रसाद ने हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना भी की थी। अपने शिष्यों को तैयार करके परीक्षार्थियों के बीच परीक्षोपयोगी भाषण देने भेजते। उन्होंने ‘भारतेन्दु पत्र’ का भी प्रकाशन किया, उस समय जबकि अंग्रेजी राज्य में स्वदेशी विचार व भाषा को आँख की किरकिरी के रूप में देखा जाता था, इन महानुभावों के प्रयत्नों को सफल करते हुए तेजस्वी महाराव उम्मेद सिंह जी ने हिन्दी को कोटा की राजभाषा घोषित कर दिया और ईंट दर ईंट साहित्य, कला व संस्कृति का यह प्रकाश-स्तंभ खड़ा होता गया।
कालांतर में समिति को हिंदी साहित्य सम्मेलन व राजस्थान साहित्य अकादमी से भी संबंद्ध करा लिया गया। इसका मुख पत्र (मासिक पत्र) ‘हाड़ौती वाणी’ भी निकाला गया, जिसका नाम कुछ वर्ष बाद ‘चिदम्बरा’ कर दिया गया जो कि राज्य पुस्तकालयों के लिए मान्यता प्राप्त है।
समिति ने हिन्दी साहित्य एवं आयुर्वेद के शिक्षा केन्द्र के रूप में ‘हाड़ौती विद्यापीठ’ की भी स्थापित की जिसके प्रयत्नों से हजारों युवाओं ने ग्राम ग्राम में आयुर्वेद को पहुँचाया। इसमें ‘कवि परिषद’ नामक काव्य मंच गठित किया जहाँ प्रति रविवार काव्य गोष्ठी में नवोदित कवियों को अवसर दिया जाता था। समिति का अपना पुस्तकालय भी था।
श्री हनुमान प्रसाद भारतेंदु भवन की नींव डालने सेठ गोविंद दास को आगे लाये। उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कोटा में करने का संकल्प लिया। सम्मेलन तो कोटा में ही हुआ किंतु उससे कुछ दिन पूर्व 28 जुलाई 1950 को वे स्वर्गारोहण कर गये।
उनके द्वारा शिलान्यास किया भवन शहर के मध्य खड़ा है। श्री हनुमान प्रसाद सक्सेना के बाद उनके संकल्पों को गति प्रदान करते हुए उनके साथी श्री कुंदन लाल गौड़ तथा साथ में श्री गुलाब चंद्र सोगानी, डॉ. मथुरा लाल शर्मा, श्री नाथूलाल जैन ‘वीर, हरि वल्लभ ‘हरि’, डॉ. रामचरण ‘महेन्द्र’ एवं श्री हनुमान प्रसाद के पुत्र श्री रमेश ‘अनिल’ तथा हनुमान प्रसाद जी के शिष्य श्री शिव नंदन चतुर्वेदी, डॉ. औंकारनाथ चतुर्वेदी, श्री महावीर प्रसाद शर्मा (एडवोकेट), वैद्य बद्री प्रसाद व्यास, प्रशासनिक अधिकारी रहे श्री श्री नारायण वर्मा आदि ने बड़ी भूमिका निभाई।
समिति द्वारा वेदव्यास, धनवन्तरी, वाल्मिकी, कालिदास, तुलसी, सुधीन्द्र जयंती, हनुमान प्रसाद स्मृति दिवस, भारतेन्दु जयंती, शरदोत्सव, बसंतोत्सव, स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस भी आयोजित किए जाते थे। समिति द्वारा कवि परिषद के माध्यम से हनुमान प्रसाद चल वैजयंती एवं काका हाथरसी पुरस्कार की भी स्थापना हुई।
श्री हनुमान प्रसाद के भारतेन्दु समिति के स्वर्ण जयंती के आयोजन के सपने को पूर्ण किया उनके पुत्र श्री रमेश ‘अनिल’ एवं उनके सहयोगियों ने जिनमें दिन-रात एक करके श्री श्री नंदन चतुर्वेदी ने पूरा साथ दिया। 1978 में स्वर्ण जयंती का भव्य आयोजन तत्कालीन
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राज्यपाल डॉ. रघुकुल तिलक की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर स्वर्ण जयंती स्मारिका के साथ काव्य संग्रह ‘स्वर्ण कलश’ व कहानी संग्रह ‘स्वर्ण-रश्मि’ का प्रकाशन किया गया।
वर्ष 2001 से प्रसिद्ध समाजसेवी श्री राजेश कृष्ण बिरला एवं श्री हरिकृष्ण बिरला के सानिध्य एवं प्रयासों से प्रत्येक वर्ष 9 सितंबर भारतेंदु जयंती पर अटक से कटक तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक से चयनित साहित्यकारों को ‘साहित्य श्री सम्मान’, एक संगीत साधक को ‘स्वर-सुधा श्री सम्मान’ तथा एक हिन्दी प्रचारक व सहित्यकार को ‘आचार्य हनुमान प्रसाद सक्सेना सम्मान’ से अलंकृत किया जाता है। इसी क्रम में इस वर्ष भारत भर से चयनित 15 साहित्यकारों को ‘साहित्य श्री सम्मान’ राष्ट्रीय बाल पुरस्कार एवं राज संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत युवा गायिका आस्था सक्सेना को ‘स्वर सुधाश्री सम्मान’ एवं ‘आचार्य हनुमान प्रसाद सक्सेना सम्मान’ डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन भोपाल को प्रदान किया जा रहा है। इससे पूर्व में ‘आचार्य हनुमान प्रसाद सक्सेना सम्मान’ पतंजलि योगपीठ से योग ऋषि स्वामी रामदेव, पंडित सुरेश तातेड़ भोपाल, डॉ. इंद्रेश पथिक देव संस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज एवं श्री श्याम देवपुरा साहित्य मंडल श्री नाथद्वारा एवं अन्य को दिया जा चुका है। सौभाग्य की बात है कि इस शताब्दी समारोह में मेरी पुस्तक “सांगीतिक काव्य के अद्वितीय रचनाकार पं. रामाश्रय झा “रामरंग” का विमोचन भी संपन्न होने जा रहा है। प्रतिवर्ष साहित्यकारों से संपर्क एवं कार्यक्रमों का मंच संचालन वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर शर्मा ‘रामूभैया करते आ रहे हैं।
प्रस्तुत लेख में तथ्य व जानकारी का आधार श्री हनुमान प्रसाद के शिष्य व समिति के पूर्व प्रधानमंत्री श्री महावीर प्रसाद शर्मा के लेख व भाषण हैं।
आज श्री भारतेन्दु समिति अपनी शतवर्षीय यात्रा पूर्ण कर नई सदी में पदार्पण करने जा रही है। इस अवसर पर स्व. श्री हनुमान प्रसाद सक्सेना एवं उनके साथियों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि व शत्-शत् नमन् !
लेखिका- डॉ. संगीता सक्सेना (संगीताचार्य) पौत्री, स्व. श्री हनुमान प्रसाद सक्सेना, एवं पुत्री स्व. श्री रमेश ‘अनिल’


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