डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल हिमालयन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटद्वार, गढ़वाल के शिक्षा विभाग में आज भारत के महान संन्यासी और युग प्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
बी०एड० विभागाध्यक्ष प्रो० बी.सी. शाह एवं डॉ० एस के आर्य द्वारा दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द भारतीय समाज के महान आध्यात्मिक चिंतक थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति, वेदांत दर्शन और मानवता के संदेश को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित किया। वे केवल संत ही नहीं थे, बल्कि क्रांतिकारी विचारक, समाज सुधारक और युवाओं के प्रेरणा स्रोत थे। उनका जीवन आत्मबल, सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित था। उन्होंने भारतीय समाज को आत्मगौरव और आत्मविश्वास की नई चेतना प्रदान की।
कार्यक्रम में प्रतिभागी छात्रा अंजली ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनका मूल नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त, एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे तथा माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक और संस्कारशील थीं। बचपन से ही नरेन्द्र नाथ में साहस और सत्य को जानने की जिज्ञासा थी। वे ईश्वर के अस्तित्व को लेकर गहन प्रश्न करते थे।
छात्रा स्वाति ने कहा कि नरेन्द्र नाथ दत्त ने पाश्चात्य दर्शन, विज्ञान, साहित्य और तर्कशास्त्र का गहन अध्ययन किया। वे अत्यंत बुद्धिमान छात्र थे और तर्क-वितर्क में निपुण थे। शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया, परंतु उनका मन आध्यात्मिक शांति की खोज में लगा रहता था। वे ऐसे गुरु की तलाश में थे जो उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार करा सके।
छात्रा मानसी ने कहा कि नरेन्द्र नाथ का जीवन तब बदल गया जब वे रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए। रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग दिखाया। उन्होंने विवेकानन्द को यह सिखाया कि सभी धर्म सत्य हैं और मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। गुरु की शरण में नरेन्द्र नाथ एक महान संन्यासी बने।
बी.ए. विभाग की छात्रा रितिका बिष्ट ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद नरेन्द्र नाथ ने संन्यास धारण किया और स्वामी विवेकानन्द कहलाए। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया और देश की गरीबी, अज्ञानता और सामाजिक विषमता को निकट से देखा। इससे उनके भीतर राष्ट्र सेवा की भावना और प्रबल हुई। उन्होंने अनुभव किया कि भारत का उद्धार शिक्षा और आत्मविश्वास से ही संभव है।
छात्र सचिन ने कहा कि सन 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके भाषण की शुरुआत “मेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों” से हुई, जिसने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया।इस अवसर पर बीएड विभाग के समस्त शिक्षक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे


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