वीरेश मधुकर : एक महान कलाकार, देशभक्त, स्वतंत्रता सेनानी – प्रो0 सुधा अग्रवाल का लेख
भारत को स्वतंत्र कराने में ज्ञात-अज्ञात जिन अनगिनत वीरो ने अपना सहयोग दिया, जीवनोत्सर्ग किया उनकी निःस्वार्थ सेवा, त्याग और जिजीविषा की प्रशंसा में शब्द असमर्थ एवं कम पड़ते हैं। तत्कालीन वातावरण एवं देश को स्वाधीन करने में 10-12 वर्ष के बच्चे भी सक्रिय एवं सहयोगी होकर अपना-अपना योगदान यथाशक्ति – यथामति दे रहे थे।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख नगर मेरठ से ही सन् 1857 में अंग्रेजी सत्ता से विद्रोह की चिंगारी लगी थी, उसी मेरठ में श्री अभिमन्यु कुमारजी के घर में 23 दिसम्बर 1935 को पुत्र जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने रखा ‘वीरेश’ । पूत के पाँव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं। यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करते बालक वीरेश बचपन से ही बहुत स्वाभिमानी और साहसी थे।
बाल्यावस्था से ही बड़े भाई अशोक के साथ जनसंघ की प्रातः कालीन व्यायाम, प्रभात फेरी और समूहगान आदि में सक्रिय भाग लेना तथा देश को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने का जज्बा उनमें कूट-कूट कर भर गया था।
केवल 10-12 वर्ष की आयु में ही वीरेश भाई अपनें गायन तथा उत्साही कार्यों से संघ की सभाओं में बहुत लोकप्रिय हो गये थे और दो-तीन बार बड़े भाई अशोक व अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार होकर जेल की हवा खा चुके थे। सन् 1947 में भयंकर उथल-पुथल व स्वतंत्रता के आन्दोलनों में विस्थापित व भुगत भोगियों के शिविरों में जाकर सहायता करना, भजन तथा देशभक्ति के गीतों द्वारा निराश, निराश्रितों की सहायता करना तथा उत्साहित करना वह बड़ी लगन से करते थे।
15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, खूब जश्न मनाए गये देश में प्रसन्नता, आत्माभिमान तथा नव बयार की लहर छा गई। लेकिन देश का विभाजन हुआ, हजारों लोग बेहद गरीबी, बीमारी और हताशा से ग्रस्त हुए। जिनकी तन मन तथा धन से सहायता सभी देश प्रेमियों ने की । भैया उसमें असीम उत्साह से भाग लेते थे।
कुछ बड़ा होने और शिक्षा प्राप्ति से ज्ञानवर्धन होने पर ज्ञात हुआ कि हमारे देश का एक हिस्सा अभी भी – गोवा स्वतंत्र नहीं है तथा पुर्तगालियों के आधीन है। देश में यह चेतना जागृत होने लगी तो फिर भाई वीरेश को भी नया लक्ष्य मिल गया। अनेक शहरों में फिर से क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित होने लगी।
आजादी के दीवानें गोवा को औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र कराने हेतु वहाँ जाते और पुर्तगालियों के अत्याचार सहते । वीरेश भाई ने मेरठ में इस क्रान्ति की अलख जगाई। ” ऐ मेरे वतन मेरी जिन्दगी-तेरे सजदे में मेरी जान रहे, ये दिल की तमन्ना है आखिरी, तेरी माटी में ही मिल जाऊ पर जगमें सदा तू महान रहे ।
इस प्रकार जीवनोत्सर्ग की तीव्र आकांक्षा के सात सेनानियों का दल तैयार किया । यह सम्भवतः सन् 1952-53 की बात है मैं तब बहुत छोटी थी। यह पहला दल था जिसनें रात के समय जंगलों – जगलों से जाकर सीधे पंजिम पहुंचकर पुर्तगाली झण्डा उतार कर भारत का तिरंगा झण्डा फहरा दिया था “तेरे तीनों रंग सलामत रहें, तेरे हरेक रंग पर मर जाऊँ” । पुर्तगाली पुलिस ने अत्यंत अमानवीय अत्याचार किये। अपने जूतों से छाती पर चढ़कर रोंदा, बन्दूक की बट से मारा, पानी के लिये तरसाया, उनको पसलियाँ टूट गई , सिर फूट गये पर हिम्मत नहीं हारी , भारत माता की जय बोलते रहे जबतक बेहोश नहीं हो गये।
उन वीरों का पता पूना से अस्पताल से सन्देश आने पर ज्ञात हुआ, तब मेरे पिताजी और बड़े भाई सभी घायलों व वीरेश भाई को थोड़ा स्वस्थ होने पर मेरठ लेकर आये थे। बाद में स्वतंत्रता के 14 वर्ष बाद 1961 में “आपरेशन- विजय” द्वारा सेना नें गोवा को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराया। भैया को उनको देशभक्ति व सक्रियता के कारण सम्मानित भी किया तथा उनके परम मित्र प्रसिद्ध कवि नीरज जी, भारतभूषण जी तथा सरल’ जी के सानिध्य में हमारे घर पर खूब काव्य गोष्ठियाँ भी आयोजित हुई।
बाद में भैया ने बी.काँम. किया | यूपी में गायन प्रतियोगिता में “तानसेन” पुरस्कार प्राप्त किया। यूपी से ही नाट्य कला में अभिनय में चयनित होकर दिल्ली में प्रारम्भ “नेशनल स्कूल आफ ड्रामा ” के प्रथम बैच में प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा तत्पश्चात उसी क्षेत्र में कार्य करते हुए मुम्बई चले गये जहाँ उन्होंने फिल्म लाईन में अनेक फिल्मों में कार्य किया प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्री ख्वाजा महमद अब्बास से उन्हें काफी नजदीकियों हुई तब भैया ने अपनी गोवा स्वतंत्रता के प्रयास की कहानी सुनाई तो अब्बास साहब बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गोवा को मुक्त कराने के प्रयास की इस सच्ची कहानी पर फिल्म “सात हिन्दुस्तानी” जो 1969 में रिलीज हुई थी बनाई ।
यह श्री अमिताभ बच्चन जी की पहली फिल्म थी , भैया ने भी इसमे मद्रासी युवक का अभिनय किया था। अमिताभ जी को भी ‘मधुकर’ भैया की अवश्य स्मृति होगी । सात कलाकारों का अभिनय कलाकार मधु, उत्पल दत्त, मधुकर, जलाल आगा, अनवर अली और अमिताभ जी ने किया था।
भैया गायन, नृत्य, अभिनय, कविता इन सभी कलाओं में निष्णात थे। उनके मद्रासी युवक के अभिनय से प्रभावित होकर मदास के फिल्म निर्देशक दासारि नारायण राव ने आग्रह पूर्वक भैया को वहाँ बुलाकर अपना असिस्टेण्ट बना लिया। भैया ने अनेक फिल्मों में अभिनय किया और अपना विशिष्ट स्थान बनाया।
दिनांक 22 फरवरी 1991 को दुर्भाग्यवश रोड एक्सीडेण्ट में उनका देहावसान हो गया। ऐसे अद्भुत, महान देशभक्त, कलाकार का गुमनामी के अन्धेरों में खोजाना बहुत वेदना देता है।
स्वतंत्रता दिवस पर उस आजादी के दीवानें गुमनाम वीर नायक को श्रद्धापूर्वक नमन करती हूं और स्वयं को गौरवान्वित समझती हूं । यादों में तो वे सर्वदा ही बनें रहते हैं। उन्हीं के प्रभाब से मैंने संगीत गायन, वादन, काव्य, नृत्य, नाटक आदि को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाया।
भैया मेरे । आपको मेरा शत-शत प्रणाम |
लेखिका :
संगीत ऋषि कला पुरोधा प्रो सुधा अग्रवाल


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