उत्तरकाशी: राजकीय महाविद्यालय चिन्यालीसौड़ में आज 07 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति, स्थानीय अनाज एवं जैव विविधता आधारित फसलों के संरक्षण तथा इनके पोषण, औषधीय एवं आर्थिक महत्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर प्रभात द्विवेदी जी की अध्यक्षता एवं मार्गदर्शन में गढ़भोज दिवस का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन हिमालय पर्यावरण जड़ी-बूटी एग्रो संस्थान ‘जाड़ी’ द्वारा वर्ष 2000 से संचालित गढ़भोज अभियान की भावना के अनुरूप किया गया। गढ़भोज अभियान के माध्यम से उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन को व्यापक पहचान दिलाने तथा स्थानीय खाद्य परंपराओं को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2022 से प्रत्येक वर्ष 07 अक्टूबर को गढ़भोज दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ की गई है।
इस अवसर पर महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा उत्तराखंड के विभिन्न पारंपरिक व्यंजन एवं पकवान तैयार कर प्रस्तुत किए गए तथा उनके माध्यम से प्रदेश की समृद्ध खान-पान परंपरा को प्रदर्शित किया गया। विद्यार्थियों एवं आयोजन समिति के द्वारा मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, आलू के गुटके, फाणू, कापा, भांग की चटनी, गहत भरी पूरी, आलू की पूरी, पहाड़ी रायता, बड़ील, असके, खटाई, स्वाले, कद्दू का साग, गुलगुले, पत्युड, पुलाव, पहाड़ी तिल की चटनी, दाल के पकौड़े, नारियल की चटनी, मंडुवे के लड्डू, लाल चावल की खीर तथा अन्य पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. प्रभात द्विवेदी जी ने कहा कि गढ़भोज दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध खाद्य विरासत, स्थानीय कृषि परंपराओं और पहाड़ की जीवनशैली से नई पीढ़ी को जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। मंडुवा, झंगोरा, ज्वार, चौलाई तथा अन्य स्थानीय अनाज हमारी खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के अभिन्न अंग हैं। इनके संरक्षण और प्रोत्साहन में युवा पीढ़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय एवं पारंपरिक खाद्य पदार्थ पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन और बदलती जीवनशैली के कारण खाद्य एवं पोषण सुरक्षा नई चुनौतियों का सामना कर रही है, तब हमारी पारंपरिक खाद्य प्रणालियां एक व्यवहारिक और टिकाऊ विकल्प प्रस्तुत करती हैं। विद्यार्थियों को स्थानीय अनाज एवं पारंपरिक व्यंजनों के महत्व से परिचित कराना समय की आवश्यकता है।
गढ़भोज दिवस-2026 की थीम “गढ़भोज: स्वस्थ उत्तराखंड की ओर एक सशक्त कदम” के अनुरूप आयोजित इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, स्थानीय खान-पान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण संदेश दिया। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित प्राध्यापकों एवं छात्र-छात्राओं ने उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति एवं स्थानीय फसलों के संरक्षण तथा इनके अधिकाधिक उपयोग के प्रति जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ किरण जोशी, डॉ कृष्णा डबराल, डॉ यशवंत सिंह, डॉ नेहा बिष्ट, डॉ आराधना राठौर और डॉ मंजू पांडे ने संयुक्त रूप से किया।
इस अवसर पर महाविद्यालय के डॉ किशोर सिंह चौहान, डॉ बृजेश चौहान, डॉ खुशपाल, डॉ विनीत कुमार, डॉ भूपेश चंद्र पंत, डॉ सुगन्धा वर्मा, डॉ प्रभात कुमार सिंह, डॉ अशोक कुमार अग्रवाल, डॉ आलोक बिजल्वाण, डॉ कुलवीर सिंह राणा, श्रीमती उर्वशी जुयाल, श्री राजेश राणा, श्री स्वर्ण सिंह, श्री मदन सिंह, श्री रोशन लाल, श्री होशियार सिंह, श्री जीतेन्द्र सिंह, श्री जय प्रकाश भट्ट, श्री सुनील गैरोला, श्री अमीर सिंह चौहान, श्री सुनील रमोला, श्री नरेश रमोला, श्री कौशल सिंह बिष्ट, श्री धनराज सिंह बिष्ट, श्रीमती हिमानी रमोला, श्रीमती विजय लक्ष्मी, श्री संजय कुमार, श्री रमेश चंद्र एवं बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।



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