कोटा। सुरों के सच्चे साधक, सादगी की प्रतिमूर्ति और राजस्थान की संगीत विभूति प्रो. राजेन्द्र माहेश्वरी जी 30 सितम्बर 2026 को अपनी 31 वर्षों की गरिमामयी और बेदाग राजकीय सेवा पूर्ण कर सेवानिवृत्त हो गए हैं। उनके सेवानिवृत्त होने पर कोटा सहित प्रदेश के संगीत जगत और शिक्षा विभाग में विदाई सह सम्मान समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें उनके योगदान को याद कर विनीत भाव से नमन किया गया।
31 वर्षों की ऐतिहासिक सेवा यात्रा
जयपुर के वैश्य परिवार में 16 सितम्बर को जन्मे प्रो. माहेश्वरी बचपन से ही सुरीली आवाज़ के धनी रहे हैं। उन्होंने मार्च 1995 में राजस्थान कॉलेज शिक्षा सेवा से अपने करियर की शुरुआत की। अपनी 31 वर्षों की सेवा यात्रा के दौरान उन्होंने:
- सिरोही महाविद्यालय: 4 माह सेवा दी।
- बूंदी महाविद्यालय: 17 वर्षों तक संगीत की अलख जगाई।
- राजकीय कला कन्या महाविद्यालय, कोटा: जीवन के महत्वपूर्ण 15 वर्ष समर्पित कर अनगिनत छात्राओं के भविष्य को संवारा।
पटियाला घराने की तालीम और संगीत साधना
प्रो. माहेश्वरी ने संगीत की उच्च शिक्षा गुरु-शिष्य परंपरा के तहत पटियाला घराने के प्रख्यात उस्ताद बाकर हुसैन खां साहेब से विधिवत् तालीम हासिल कर प्राप्त की। उन्होंने संगीत में NET और विद्या वारिधि (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2018 से वे संगीत विषय में आचार्य (प्रोफेसर) के पद पर सेवाएं दे रहे थे।
अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से हुए सम्मानित
शिक्षा और संगीत के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें मुख्य हैं:
- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- जवाहर कला केन्द्र, जयपुर द्वारा सम्मान
- ‘स्वर सुधा श्री’ अवार्ड सहित देश-प्रदेश के कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान।
शिष्यों की लंबी कतार और समृद्ध परिवार
प्रो. माहेश्वरी ने अपनी कला से शिष्यों की एक समृद्ध पौध तैयार की है। उनके प्रिय शिष्यों में प्रिया भटनागर, डॉ. दुष्यंत त्रिपाठी, डॉ. गणेश बारेठ, केवल कृष्ण गौतम, शैलेन्द्र सिंह हाड़ा, आस्था सक्सेना, दर्शना विजय, धीरज राव सहित अनेक नाम शामिल हैं जो आज संगीत जगत में पहचान बना रहे हैं। उनके इस सफ़र में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रेखा माहेश्वरी और चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पुत्री पूर्वा माहेश्वरी का हमेशा संबल रहा।
समस्त संगीत परिवार ने जताया आभार
देवेंद्र कुमार सक्सेना एवं कोटा के समस्त संगीत परिवार ने प्रो. माहेश्वरी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि वे सरस्वती के सच्चे आराधक हैं।
उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की है कि सेवानिवृत्ति के बाद का उनका जीवन सपरिवार स्वस्थ, मंगलमय, प्रसन्नता से भरपूर और निरंतर संगीत-साधना में लीन रहे। 31 वर्षों की इस अतुलनीय सेवा के लिए पूरा संगीत जगत उन्हें कोटि-कोटि नमन करता है।



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