भारत वैश्विक राजनीति के केंद्र में क्यों ? विषय पर डॉ विकाश शुक्ला का ज्ञानवर्धक लेख| डॉ विकाश शुक्ला आप राजकीय डिग्री कॉलेज जखोली रुद्रप्रयाग उत्तराखंड में राजनीति विज्ञान में हेड ऑफ डिपार्टमेंट तथा तथा सहायक प्रोफेसर है|

भारत वैश्विक राजनीति के केंद्र में क्यों ?…..

ब्रिटेन(दुनिया का सबसे बड़ा आलोकतांत्रिक देश) के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन हाल ही में भारत दौरे पर आए, यह दौरा काफी पहले ही मुकम्मल होना था परंतु कोरोना महामारी के कारण यह टलता गया

यहाँ मैं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के भारत दौरे का विश्लेषण करने नहीं जा रहा बल्कि एक प्रश्न उठा रहा हूँ कि विश्व की महाशक्तियाँ भारत के साथ संबंधो को प्रगाढ़ करने और उन्हे नए स्तर पर ले जाने में इतनी रुचि क्यों रख रहीं हैं?

हाल ही में हमने देखा कि भारत और अमेरिका के मध्य 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता भी सम्पन्न हुई जो अमेरिका के लिए भारत की महत्ता को प्रदर्शित करता है| इसके अलावा रूस-उक्रेन संकट के दौरान भी हमने देखा कि कैसे दोनों ही खेमों ने भारत के सहयोग की जरूरत का समर्थन किया| यानि कि चाहे अमेरिका हो, रूस हो, जापान हो, फ्रांस हो या फिर आसियान और यूरोपियन यूनियन जैसे संगठन हों या फिर बहु-राष्ट्रीय खेमें सभी भारत से मित्रता करने के लिए प्रयासरत हैं| परंतु क्या यह स्थिति एकाएक निर्मित हो गई है? इन्ही कारणों कि मैंने इस लेख में पड़ताल करने की कोशिश की है? क्योंकि वैश्विक सम्बन्धों में एक कहावत प्रचलित है कि यहाँ मित्रता हो या शत्रुता बगैर हितों या मतलब के कुछ नहीं होता|

इस संदर्भ में अर्थशास्त्र में कौटिल्य के द्वारा कहा गया यह वक्तव्य अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर हूबहू चरितार्थ होता है कि ‘दुनिया में सभी प्रकार के संबंध हितों पर आधारित होते हैं’ जिसे मैं “KAUTILYA’S PLAN” से संबोधित करता हूँ|
हम सब जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों में भारत की साख अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे उभरी है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नही है कि भारत इससे पूर्व में अलग-थलग (Isolation) रह रहा था| प्राचीन समय में ही भारत का विश्व के अन्य भागों के साथ संपर्क स्थापित हो गया था| सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान ही हमने मेसोपोटामिया और इजीप्ट जैसे क्षेत्रों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित कर लिए थे| लेकिन जैसे-जैसे हम भारतीय इतिहास में आगे बढ़ते हैं हमारे विदेशी देशों के साथ संबंध और सशक्त होते नज़र आते हैं|

रोमन लेखक प्लिनी यहाँ तक लिखते हैं कि ‘विश्व का सारा सोना भारत में आकार सिकुड़ जाता है’ कहने का मतलब यह है कि उस समय भारत विश्व व्यापार में प्रभावी भूमिका अदा करता था| हम कॉटन, मसाले, जेम्स और आइवरी जैसी वस्तुओं का निर्यात करते थे, जिसके एवज में हमें सोना और चांदी प्राप्त होता था| यही वह मुख्य कारण था जिस वजह से भारत को सोने की चिड़िया कहा जाने लगा| व्यापार के साथ-साथ ही कूटनीतिक सम्बन्धों की शुरुआत हो चुकी थी|

मौर्यकाल से ही राजदूतों की नियुक्ति का सिलसिला चला आ रहा है| चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में ग्रीक राजदूत मेगस्थनीज भारत आए और आगे चलकर चीन से राजदूत भारत आते हैं| इसके साथ-साथ भारत से भी अनेक देशों में राजदूत भेजे गए| भारत की बढ़ती हुई समृद्धि का परिणाम यह भी था कि यहाँ पर विदेशी आक्रमण शुरू हो गए| जिसमें मुस्लिम आक्रमणों का लंबा सिलसिला शुरू होता है| लेकिन मध्यकाल में भी भारत का दुनिया के साथ संबंध बना रहता है|

अतः 17 वीं शताब्दी में यूरोपीय कंपनियाँ भारत पहुँचने लगती हैं और इसका दुष्परिणाम यह होता है कि औपनिवेशिक काल में भारतीय विदेशी संबंध ब्रिटिश हितों के हिसाब से चलाये जातें हैं| भारतीय इतिहास में बस यही वह समय था जब भारतीय प्रतिष्ठा कुछ खास नज़र नहीं आती परंतु ब्रिटेन (दुनिया का सबसे बड़ा आलोकतांत्रिक देश) के लिए भारत की क्या महत्ता थी, यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि उन्होने फ्रांस से लेकर रूस तक अपने भारतीय साम्राज्य की रक्षा के लिए युद्ध किए|

इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत अपनी विदेश नीति अपने अनुसार चलाने के लिए स्वतंत्र था| भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू भारतीय विदेश नीति का निर्देशन करते हैं और वह इसे पंचशील जैसे सिद्धांतों को गुटनिरपेक्षता के साथ जोड़ देते हैं| इस दौरान भारत नव-स्वतंत्र राष्ट्रों और अविकसित देशों की आवाज़ भी बनता है| एशिया और अफ्रीका के कई देश भारत को एक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखने लगते हैं|

भारत 1940 के दशक में इन्डोनेशिया का समर्थन करता है जो डच औपनिवेश का शिकार था| इसी तरह अफ्रीकन देशों के राष्ट्रीय आंदोलनों को भी पूर्ण समर्थन देता है| इसका परिणाम यह होता है कि भारत की पहचान साम्राज्यवाद के विरोधी और लोकतन्त्र के समर्थक के रूप में बन जाती है| इसी वजह से भारत वैश्विक स्तर पर अपनी एक अलहदा जगह बनाने में कामयाब रहता है|

भारत का वैश्विक सम्बन्धों में भूमिका का यह एक ऐतिहासिक विश्लेषण था| अब बात करते हैं कि वर्तमान में ऐसे क्या कारण हैं कि वैश्विक पटल पर भारत कि मित्रता सभी देशों को अच्छी लगाने लगी है| अब केवल विकासशील और अल्पविकसित देश ही नहीं बल्कि तथाकथित विकसित देश भी भारत के साथ मित्रता को बढ़ाने का हरसंभव प्रयास कर रहें हैं| मैंने इन्ही कारणों को जानने की कोशिश की है| भारत के साथ संबंधो के लेकर राष्ट्र-राज्यों के भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं जैसे रणनीतिक और आर्थिक हितों को पूरा करना, परंतु कुछ ऐसे व्यापक हित हैं जो सभी देशों को भारत की तरफ आकर्षित करते हैं-
भारत का जनसांख्यिकीय महत्व
भारत के पास वर्तमान में सबसे अधिक युवा जनसंख्या है| भारत की करीब 62.5 % जनसंख्या वर्किंग आयु वर्ग यानि 15 वर्ष से 59 वर्ष की आयु वर्ग से संबंध रखती है| आपके मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ रहा होगा कि भारत की जनसांख्यिकीय का विदेशी देशों को क्या लेना देना? इसका उत्तर यह है कि भारत दुनिया को एक बड़ा आकर्षित बाज़ार उपलब्ध कराता है| साथ ही आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दौर में सस्ते श्रम के रूप में भी देखा जाता है|
भारत की रणनीतिक स्थिति
भारतीय हिन्द-महासागर के केंद्र में स्थित होने कारण भारत का संपर्क एक तरफ तो मेडीटेरानियन मार्ग से आने वाले व्यापार के साथ बनता है और दूसरी तरफ पैसिफिक क्षेत्र के साथ | वैश्विक सम्बन्धों में हिन्द-महासागर को एक उभरते हुए महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है और ऐसा होने के पीछे मजबूत आर्थिक और रणनीतिक तर्क है| विश्व के सम्पूर्ण तेल मैरिटाइम का 80% हिन्द-महासागर से होकर गुजरता है| इसमें गल्फ ऑफ ओमान के मध्य में स्थित स्ट्रेट ऑफ होरमुज , स्ट्रेट ऑफ मलक्का और बाब-एल-मंदेब शामिल है, और भारत की केंद्रीय स्थिति इन सभी को नियंत्रित और संचालित करने की सामर्थ्य प्रदान करती है|

राजनीतिक रूप से हिन्द-महासागर रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है| चीन इस पूरे क्षेत्र के आस पास से अपने वन-बेल्ट-वन-रोड प्रोजेक्ट के तहत सैकड़ों बिलियन का निवेश कर रहा है, जिसे अमेरिका, जापान, फ्रांस, भारत और आस्ट्रेलिया जाइए देश एक खतरे के रूप में देख रहे हैं|

यही वजह है कि ये सभी देश भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी में इक्षुक हैं| क्वाड इसी रणनीतिक साझेदारी का परिणाम है| चीनी खतरे के कारण आसियान राष्ट्र भी भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं क्योंकि भारत दक्षिण-चीन सागर में चल रहे संघर्ष में इन्हे सहयोग प्रदान करता है|

भारत की रक्षा के क्षेत्र में सामर्थ्य उसे इस काबिल बनाती है कि वह SAAGAR (Security and Growth for all) जैसे कदम उठा पा रहा है| और जिस तरह समकालीन संकट के समय अमेरिका ने अपने हांथ खड़े कर दिये हैं, उससे आसियान राष्ट्रों को यह स्पष्ट समझ आ गया है कि अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर आश्रित नहीं हुआ जा सकता| ऐसे में वह भारत को सुरक्षा प्रदान करने वाले देश के रूप में देखते हैं| भौगोलिक और रणनीतिक कारकों के पश्चात जो कारक प्रकाश में आता है वो है आर्थिक कारक |
भारत की आर्थिक स्थिति
विश्व आर्थिक लीग के आंकड़ों के अनुसार 2031 तक भारत की अर्थव्यवस्था 6.8 ट्रिलियन अमेरिकी डालर से ज्यादा की जीडीपी के साथ विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी|

इसके अलावा भारत में निवेश के अवसर दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित कर रहें हैं| जैसे जापान ने अगले 5 वर्षों में भारत में 42 बिलियन डालर निवेश करने का लक्ष्य रखा है| वहीं ब्रेटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने हालिया दौरे के दौरान करीब 1 बिलियन पाउंड का निवेश करने की डील की|

इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात ने फरवरी 2022 में भारत के साथ 100 बिलियन डालर का निवेश करने का समझौता किया| यानि की दुनिया की सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थायेँ भारत में निवेश करना चाह रही हैं|
भारत की राजनीतिक स्थिति
आर्थिक कारकों के साथ-साथ राजनीतिक कारक भी बहुत महत्व रखते हैं| देखा जाए तो मध्य-पूर्व में बहुत सारे ऐसे राष्ट्र हैं जो अपने तेल की बदौलत भारत से कहीं ज्यादा समृद्ध हैं परंतु अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के लिहाज से उनकी तुलना भारत से नहीं की जा सकती, ऐसा इसलिए क्योंकि मध्य-पूर्व का राजनीतिक इतिहास और वर्तमान अस्थायित्व और संघर्ष से भरा रहा है|

वहीं दूसरी तरफ भारत की लोकतान्त्रिक पहचान बहुत उच्च है, क्योंकि आज़ादी से लेकर आज तक भारत ने सैन्य शासन को लागू नहीं किया, जबकि भारतीय उपमाद्वीप के अन्य राष्ट्रों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव) में सैन्य शासन और तख्तापलट की घटनाएँ बहुत सामान्य रहीं है, जबकि भारत की लोकतान्त्रिक छवि को पूरी दुनिया मानती है| स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा राजनीतिक स्थायित्व भारत को अन्य मध्य-पूर्व और दक्षिण एशियाई देशों से पृथक करती है| और यही कारण है कि भारत को यह विश्व के अन्य देशों का स्वाभाविक लोकतान्त्रिक सहयोगी बनाती है| फ्रांस हो, ब्रिटेन हो या अमेरिका सभी भारत के साथ साझे लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करते हैं| इसके अलावा वर्तमान भारतीय नेतृत्व प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की बहुमत की सरकार के कारण वैश्विक नेताओं का भारत को लेकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज विश्व के प्रमुख प्रभावशाली नेताओं में शुमार किए जाते हैं| उनके द्वारा लिए जाने वाले स्पष्ट और बोल्ड निर्णयों ने भारत को वैश्विक सम्बन्धों की धुरी पर लाकर खड़ा कर दिया है| (उदा. हाल में जारी रूस-उक्रेन संकट)|
प्रवासी समुदाय
राजनीतिक कारकों के साथ ही एक अन्य कारण अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में मुख्य भूमिका का निर्वाह करता है और वो है प्रवासी समुदाय | भारतीय प्रवासी समुदाय को वर्तमान में सबसे सक्रिय और प्रभावी प्रवासी समुदाय कहा जा सकता है| संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार करीब 18 मिलियन जनसंख्या के साथ भारतीय प्रवासी समुदाय विश्व का सबसे बड़ा समुदाय है|

प्रवासी समुदाय और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का बहुत घनिष्ठ संबंध है, क्योंकि यह किसी भी देश की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है| उदाहरण के लिए अमेरिका और कनाडा की नीतियों को भारतीय समुदाय किस हद तक प्रभावित करता है यह किसी से छुपा नहीं है| आज विश्व में भारतीय समुदाय के 200 से अधिक लोग महत्वपूर्ण पदों पर हैं| इसमें हाल ही में जुडने वाला नाम अमेरिका की उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस का है| ये प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक के पदों को सुशोभित कलर रहें हैं|

जैसे- पुर्तगाल के प्रधानमंत्री अंटोनिओ कोस्टा, मारीशस के प्रधानमंत्री प्रविन्द जुग्नौथ, गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली यह सभी भारतीय मूल के ही हैं| यही कारण है कि यह सभी देश भारत के साथ एक मजबूत सम्बन्धों को महसूस करते हैं|
भारत की सांस्कृतिक स्थिति
इसके लावा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी बहुत से देशों को अपनी तरफ आकर्षित करती है| इसका सबसे बड़ा उदाहरण दक्षिण-पूर्व एशियाई देशो को कहा जा सकता है| इनके साथ प्राचीन काल से ही भारत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध रहें हैं और ये संबंध आज भी भारत और इन देशों के मध्य एक मजबूत गठजोड़ का कार्य करते हैं|
भारतीय दर्शन
इसी से मिलता जुलता कारक है भारतीय दर्शन, जो हमारी विदेश नीति को भी व्यापक रूप से प्रभावित करता है| वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा से प्रेरित होकर हम विश्व के कल्याण की बात करते हैं| इसीलिए WTO के सम्मेलन में विकासशील और अल्प-विकसित देशों के साथ में खड़ा होना हो या पर्यावरण सम्मेलनों में समता की बात को उठाना हो, भारत हमेशा ही सबको साथ लेकर चलने के पक्ष में रहा है| यही वजह है कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के विकासशील देश भारत की दोस्ती की तरफ देखते हैं| इसीलिए भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान और हाल में आर्थिक संकट से गुजर रहे श्रीलंका की आर्थिक मदद भी करता है| 2022-23 के बजट में सिर्फ अफगानिस्तान के विकास के लिए 200 करोड़ की धनराशि का प्रावधान किया गया है| इसके अलावा संकट के समय भी भारत अपने पड़ोसी देशो के साथ साथ अन्य देशों की मदद करने के लिए आगे रहता है|

चाहे बात नेपाल के भूकंप की हो या इन्डोनेशिया की सुनामी की भारत ने सबसे आगे बढ़कर मदद पहुंचाई| कोरोना महामारी के दौरान भी भारत ने वैक्सीन और मास्क अपने पड़ोसी देशों के साथ विश्व के अन्य देशों को पहुंचाई| भारत का यह मानवीय चेहरा भी उसकी दोस्ती के मूल्य को काफी बढ़ाता है|
निष्कर्ष
यही सब मुख्य कारक हैं जो विकासशील देशों से लेकर वैश्विक शक्तियाँ भारत के साथ मजबूत सम्बन्धों को बनाए रखना चाहती हैं| इसके लिए भारत सरकार भी अपनी तरफ से बहुत सारे प्रयासो को अमलीजामा पहना रही है| और यह कहा जा सकता है कि आज भारत पहले से ज्यादा बोल्ड विदेश नीति को अपनाकर वैश्विक पटल पर अपनी सशक्त भूमिका को निभा रहा है|