21 जून विश्व संगीत दिवस पर विशेष…
- भारतीय संगीत अनमोल है.. हम संगीत के स्वर्णिम युग में जी रहे हैं
- यू जी सी द्वारा ललित कलाओं के शिक्षण चयन प्रक्रिया में अकं नहीं शास्त्रीय संगीत प्रैक्टिकल ज्ञान को महत्व मिले…
विश्व संगीत दिवस पर राजस्थान के कला संस्कृति समाज सेवी देवेंद्र सक्सेना से संक्षिप्त बातचीत…
संवाददाता, कोटा : देवेंद्र कुमार सक्सेना लेखक, समीक्षक, तबला वादक, संगीत कला संस्कृति व समाज सेवी हैं पिछले दिनों राजस्थान सरकार द्वारा राज्य स्तर पर सम्मानित हुए हैं देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपके लेख, परिचय, समाचार कविता, संस्मरण प्रकाशित होते हैं। इंहे इस क्षैत्र में देश विदेश में सांस्कृतिक यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ आप संस्कार भारती चित्तौड़ प्रांत कोटा महानगर के महामंत्री हैं। 
प्रस्तुत है विश्व संगीत दिवस पर एकाग्र संक्षिप्त बात चीत…
1-प्रश्न – भारतीय संगीत के विषय संक्षिप्त में बताईयेगा?
उत्तर… भारतीय संगीत सृष्टि का सबसे प्राचीन शाश्वत सनातन संगीत है। ब्रम्हांड की मूल उर्जा ओंकार नाद है ।ओंकार ध्यान व गान देव, गंधर्व, ऋषि, मुनि, यति, योगी मानव सभी करते हैं।
देव ऋषि नारद अपनी महती वीणा से तीनों लोक में विचरण कर श्री मन नारायण.. नारायण.. नारायण.. का गान करते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।
भारतीय संगीत की उत्पत्ति वेदो से मानी जाती है । वैदिक काल में वेदों की ऋचाओं का गायन किया जाता था ।
पौराणिक कथाओं में ब्रम्हा जी को संगीत रचयिता और वीणा वादिनी माता सरस्वती को संगीत की देवी माना गया है!आदि देव भगवान शिव के डमरू और उनके तांडव नृत्य से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है।
भारतीय संगीत विभिन्न 7 कालो से गुजरना हुआ वर्तमान काल में सर्वाधिक लोकप्रिय है यह स्कूल कालेज में पढाया जा रहा है शोधार्थी शोध कर रहे हैं संगीत पर हजारों पुस्तकें लिखी जा रही है स्काॅलरशिप व पुरस्कार दिये जा रहे हैं।
संस्कृति मंत्रालय विभिन्न अकादमी एवं सरकार द्वारा सांस्कृतिक केन्द्र तथा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद आई टी सी, संस्कार भारती, इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय खैरागढ़, राजा मानसिंह तोमर विश्व विद्यालय, अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल,पंडित मधुप मुद्गल द्वारा संचालित गाधर्व महाविद्यालय दिल्ली, प्रयाग संगीत समिति,भातखंडे कालेज लखनऊ, प्राचीन कला केंद्र, स्पिक मैके, संकट मोचन संगीत समारोह, श्रावण महोत्सव उज्जैन, राव माधोसिंह म्युजियम ट्रस्ट कोटा, मेहरानगढ़ स्वर सुधा जोधपुर संगीत संकल्प,डाॅ 0 विजय शंकर मिश्र की संस्था सम, डॉ 0 कुमार ऋषितोष की नादऔरा, अहमदाबाद की सप्तक, डॉ0 मधु भट्ट तैलंग संस्था इंटरनेशनल धुव्रपद धाम ट्रस्ट , पंडित सुरेश तातेड की संस्था अभिनव कला परिषद, संगीतिका कोटा, श्री भारतेंदु समिति कोटा, डा 0 कविता शुक्ला की श्रुति मुद्रा सागर, जैसी अनेकों संस्थाएँ संगीत की सेवा में लगी हुई है। हम संगीत के स्वर्णिम युग में जी रहे हैं संगीत की प्रमुख पत्रिका संगीत, संगीत कला विहार,प्रेस जोन, कुतप, स्वर सरिता, कला समय, कला वार्ता, छायानट, रंग योग, संगीत वंदन सहित कई पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और होने जा रही है।
2-प्रश्न – संगीत का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ भरत मुनि का नाट्य शास्त्र…
भारतीय ललित कलाओं में संगीत सर्वश्रेष्ठ है। भारतीय संगीत रागात्मकता, लयात्मक, ताल, भाव व रस के कारण विश्व स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय है।इन सभी को चरितार्थ करने के लिए भरत मुनि ने दूसरी शताब्दी में नाट्य शास्त्र की रचना की नाट्य शास्त्र भारतीय कला नाट्य संगीत का अत्यन्त लोकप्रिय ग्रंथ है इसे पंचम वेद की मान्यता प्राप्त है। इसके प्रेरणास्रोत प्रवर्तक स्वयं प्रजापति हैं ऋग्वेद से पाठ्य सामवेद से गीत यजुर्वेद से अभिनय अथर्व वेद से रस का परिग्रह कर पंचम वेद का प्रादुर्भाव किया।
उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व यूनेस्को ने श्री मद्भागवत गीता और भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र को अपने मेमोरी आॉफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया है।
भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक साहित्य वैचारिक संस्था संस्कार भारती ने राष्ट्रीय स्तर पर भरत मुनि सम्मान आरंभ किया है यह सम्मान प्रतिवर्ष भरत मुनि जयंती पर दो राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों को प्रदान किया जाता है इसमें मंचीय कला, दृश्य कला, लोक कला, साहित्य कला आदि शामिल है।
अभी तक यह सम्मान कथक नृत्यांगना डॉ0 कुमकुम धर साहित्यकार डॉ 0 हरे कृष्ण मेहर, पंडवानी गायिका श्रीमती प्रभा यादव, दृश्य कला के लिए चिंतामणि हसबनीस को प्रदान किया गया है।
-प्रश्न गैस्ट फैकल्टी विद्या सम्बल योजना में इन दिनों बी. ए., एम, ए, पी. एच. डी.नेट कर ऐसे लोग भी आ गये हैं जो केवल अंको के आधार पर बिना साक्षात्कार के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में पढा रहे हैं?
इस विषय पर संगीत के बड़े बड़े गुरु कहते हैं कि संगीत व अन्य कला विषयों में डिग्री के साथ साथ प्रैक्टिकल की गहराई से समझ होगा चाहिए तभी आप किसी को सिखा कर न्याय कर सकते हैं। लगभग दो तीन दशक पहले घरानेदार गुणवान शिक्षक गुरु परीक्षक परीक्षा लेने आते थे विद्यार्थियों की कोई जान पहचान भी नहीं होती थी तब भी वे अच्छा गाने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अधिक तम 60 % +अंक देकर आशीर्वाद देते थे अगर उन्हें पता होता कि आजकल की पीढ़ी के विद्यार्थियों को थोड़ा बहुत गाने पर 80 %से अधिक नम्बर मिल जा रहे हैं और उन्हें बिना इंटरव्यू के केवल अंकों के आधार पर शिक्षक बना दिया जाता है तो वे अच्छा गाने और पढाने वाले विद्यार्थियों को 85 %, 90 %अंक देकर संगीत का भविष्य सुरक्षित कर जाते। संगीत ईश्वर प्रदत्त गुरु मुखी विद्या है आज भी कई अच्छे शिक्षक हैं किन्तु संगीत जैसी मंचीय कला में प्रैक्टिकल गायन के स्थान पर अंक प्रतिशत को चयन का मापदण्ड बना कर संगीत के शिक्षार्थियों के साथ अन्याय किया जा रहा है ।
भारतीय संगीत के विशेषज्ञों ने कहा कि आप विभिन्न डिग्रियां स्वर्ण पदक लेकर भी न तो गा सकते हैं न राग सिखा सकते हैं , तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है ऐसे में संगीत के लेखक, संयोजक आयोजक अवश्य बन सकते हैं।
और संगीत की सेवा कर सकते हैं।
प्रश्न – यूजीसी को प्रैक्टिकल विषयों के शिक्षक सहायक आचार्यों की चयन प्रक्रिया में खास कर संगीत व ललित कलाओं में 1995 से पूर्व के 60 प्रतिशत को नये 80 % के समकक्ष मान्यता देना चाहिए।
उतर-जी बिल्कुल यहीं होना चाहिए यह भी देखना चाहिए कि आज का 80% प्राप्त व्यक्ति संगीत सिखाने राग गाने और पढाने योग्य है या नहीं।


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