पैठाणी, पौड़ी गढ़वाल। आज दिनांक 07 अक्टूबर 2026 को राजकीय व्यावसायिक महाविद्यालय, बनास पैठाणी, पौड़ी गढ़वाल में प्राचार्य प्रो. (डॉ.) विजय कुमार अग्रवाल के मार्गदर्शन एवं प्रभारी प्राचार्य डॉ. कुमार गौरव जैन की उपस्थिति में गढ़भोज दिवस मनाया गया।
कार्यक्रम संयोजक डॉ. खिलाप सिंह ने सभी का स्वागत करते हुए गढ़भोज दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि यह दिवस केवल स्वादिष्ट उत्तराखंडी व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा, कृषि, प्रकृति और अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर है। उन्होंने कहा कि गढ़भोज स्थानीय किसानों को प्रोत्साहित करने, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कार्यक्रम के सहसंयोजक एवं मीडिया प्रभारी डॉ. प्रकाश फोंदणी ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थ हमारी जैव-विविधता और स्थानीय कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मालू, केला, तिमला के पत्तों में खाना खाने से ऐंटीऑक्सिडेंट गुण पाया जाता है और मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट सहित अनेक स्थानीय अनाज एवं दालें पोषण की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जोड़ना और इनके वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक महत्व को समझाना समय की आवश्यकता है। स्थानीय उत्पादों को अपनाकर हम किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पलायन की समस्या को कम करने में भी योगदान दे सकते हैं।
महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. पुनीत चन्द्र वर्मा ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन में झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, गहत की दाल, भट्ट की चुड़काणी, फाणू, रस-भात, काफली, चैंसू, सिसूण का साग, आलू के गुटके और पहाड़ी रायता जैसे अनेक पौष्टिक एवं स्वादिष्ट व्यंजन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय एवं मौसमी खाद्य पदार्थों पर आधारित यह भोजन हमारी पारंपरिक जीवनशैली और समृद्ध खाद्य विरासत को दर्शाता है।
प्राध्यापक डॉ. कामिका ने कहा कि गढ़भोज दिवस हमारी समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक खान-पान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य और पोषण का भी विशेष महत्व है। विद्यार्थियों को अपनी स्थानीय खाद्य परंपराओं को जानने और संरक्षित करने के लिए आगे आना चाहिए।
प्राध्यापक डॉ. सतवीर ने कहा कि स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि युवा स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन पर ध्यान दें, तो उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँचाया जा सकता है।
प्रभारी प्राचार्य डॉ. कुमार गौरव जैन ने कहा कि गढ़भोज हमारी संस्कृति, परंपरा और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण अभियान है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रम विद्यार्थियों को अपनी लोक संस्कृति एवं स्थानीय संसाधनों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता और उद्यमिता की भावना विकसित करने में भी सहायक हैं। उन्होंने सभी विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक व्यंजनों की सराहना की।
कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय के कर्मचारियों एवं छात्र-छात्राओं द्वारा विभिन्न स्थानीय पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनी लगाई गई। छात्र वर्ग में कु. तनिषा एवं मनीषा (बी.एससी. प्रथम सेमेस्टर) ने प्रथम स्थान, दीपिका रावत (बी.एससी. प्रथम सेमेस्टर) ने द्वितीय स्थान, दिव्यांशी (बी.एससी. प्रथम सेमेस्टर) ने तृतीय स्थान तथा प्रियांशु (बीसीए प्रथम सेमेस्टर) ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। कर्मचारी वर्ग में श्री पल्लव नैथानी, वरिष्ठ सहायक ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापक, कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थों, स्थानीय कृषि उत्पादों एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा संवर्धन के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।



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