चाहो तो, तिरंगा चाहो
गणतंत्र दिवस पर सुनीति त्यागी की कविता: चाहो तो, तिरंगा चाहो
विजन वन के बीच बैठे
क्षुब्ध काली लहर लिए,
नींद से उठो तुम एक आवाज, एक आवाज बन जाओ
चाहो तो, तिरंगा चाहो।
मौत का यह, घर नहीं है
उतर कर बहते अनेकों
काल कथा, कहते अनेकों
ऐसा झरना तुम भी बन जाओ
चाहो तो, तिरंगा चाहो।
आलोचनाओं के, चमकते तारे
करते हैं तुमको, ज़ार ज़ार
झुक कर इन्हें, स्वीकार करो
इन्हें अपनी चांदनी बनाओ
चाहो तो तिरंगा चाहो।
ना उठाएं शस्त्र गांधी ने, विवेकानंद ने,
जज्बा रखा, दुनिया बदलने का उन्होंने,
तुम भी एक ऐसी, रीत चलाओ,
चाहो तो तिरंगा चाहो,
यही देश है भगत सिंह, आजाद हिंद फौज का
तुम भी एक ऐसी, नई आशा की किरण लाओ
चाहो तो तिरंगा चाहो।
इतिहास साक्षी है, हमारी सभ्यता का,
इस संस्कृति को, अब तुम ही आगे बढ़ाओ
चाहो तो तिरंगा चाहो।
बहुत बट चुके हम धर्म और देश के नाम पर,
सद्भावना,एकता का कोई एक तो मंत्र लाओ ।
चाहो तो तिरंगा चाहो, चाहो तो तिरंगा चाहो………..
सुनीति त्यागी आप एचईसी कालेज हरिद्वार में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
poem written by Suniti Tyagi , Asst. profesor HEC college Haridwar


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