March 17, 2026

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राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी कोटद्वार में कार्याशाला व करियर काउंसलिंग का हुआ आयोजन

राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी कोटद्वार में आज दिनांक 16 .03 .2026 को करियर काउंसलिंग सेल के तत्वावधान में डिजिटल डिटॉक्स की वर्तमान युग में प्रसांगिकता विषय पर कार्याशाला व करियर काउंसलिंग का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में करियर काउंसलिंग सेल की संयोजिका डॉ0 उषा सिंह ने कार्यशाला के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि उक्त कार्यशाला में युवाओं में करियर के प्रति बढ़ते मानसिक अवसाद के द्रष्टिगत इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है।

कार्यशाला में स्वामी रामा हिमालयन यूनिवर्सिटी देहरादून, के सीनियर काउंसलर श्री प्रशांत शाही व काउंसलर बबिता भण्डारी द्वारा विद्यार्थियों को करियर विकास हेतु शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए डिजिटल डिटॉक्स और वेलनेस के विषय में जागरूक किया गया व बताया कि फोन और इंटरनेट से दूरी बनाकर तनाव कम कर, बेहतर नींद और जीवन में संतुलन बनाकर कैसे युवा अपने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर कर सकते हैं।

उन्होने डोपामिन, जिसे फील-गुड हार्मोन कहते हैं के विषय में बताते हुए कहा की खुशी के लिए मस्तिष्क को बार-बार बाहरी स्टिम्युलस की जरूरत का होना यही कारण है कि डिजिटल डिटॉक्स अब सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है। अधिकांश युवा दिन की शुरुआत मोबाइल की स्क्रीन से और सोने से पहले भी उसके साथ घंटों बिताना आधुनिक जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। एक व्यक्ति रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, और यही आंकड़ा धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है, अत्यधिक स्क्रीन टाइम मस्तिष्क के रिवॉर्ड सर्किट को बदल देता है, ये वही हिस्सा है जो खुशी, प्रेरणा और आपकी एकाग्रता को नियंत्रित करता है. डोपामिन हार्मोन जोकी हर लाइक, नोटिफिकेशन और वीडियो स्क्रॉल पर बढ़ता हैे, लेकिन लगातार देखने से दिमाग इसकी आदत डाल लेता है, और फिर जब फोन दूर रखा जाता है तो बेचैनी, थकान या मूड स्विंग महसूस होते हैं।

उन्होने कहा कि लगातार 7 दिन का स्क्रीन ब्रेक नींद के पैटर्न को 40 फीसदी तक सुधार सकता है और तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को औसतन 25 फीसदी घटा देता है। वर्त्तमान युग में युवाओं को ही नहीं प्रत्येक उम्र के व्यक्तियों को इसकी बहुत आवश्यकता है।

कार्यक्रम में महाविद्यालय आन्तरिक गुणवत्ता विनिश्चयन प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ0 विनय देवलाल ने कार्यशाला के विषय में जानकारी देते हुए कहा कि डिजिटल डिटॉक्स का उद्देश्य तकनीक से भागना नहीं, बल्कि उसके साथ एक स्वस्थ रिश्ता बनाना है, शुरुआत में छोटे प्रयास होने चाहिए जैसे सुबह उठते ही 30 मिनट तक फोन न देखें, रात को सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन बंद करें, और हर दिन ऑफलाइन टाइम के समय को बढ़ाते रहे। क्योंकि सच्चाई यह है कि हमारा दिमाग 24 घंटे ऑनलाइन रहने के लिए नहीं बना, जब हम लगातार स्क्रॉल करते हैं, तो वह हमें खुश नहीं बल्कि खाली करता है।

कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो0 हरिश्चन्द्र द्वारा छात्र छात्राओं को विषय की गंभीरता को समझने व इसके दुष्परिणामों से बचने व जागरूक रहने का आह्वाहन किया। उन्होने कहा की युवा पीढ़ी को डिजिटल का इस्तेमाल केवल जरूरी कार्यों व शिक्षात्मक लाभ हेतु करना चाहिए। उन्होने विज्ञान ,कला व वाणिज्य के छात्र छात्राओं को शिक्षा के साथ अपने विषय से सम्बंधित कौशल व तकनीकी शिक्षा आधारित कोर्स करने का आह्वाहन किया तथा कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की वर्त्तमान समय में बढ़ती प्रसांगिकता की जानकारी दी।

कार्यक्रम का संचालन डॉ0 उषा सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम में समाजशास्त्र विभाग की प्राध्यापिका डॉ0 गीता रावत शाह,अंग्रेजी विभाग की प्राध्यापिका डॉ0 इन्दु मलिक, जंतु विज्ञान की प्राध्यापिका डॉ0 अंजू थपलियाल , संस्कृत विभाग की प्राध्यापिका श्रीमती गीता, हिन्दी विभाग की प्राध्यापिका श्रीमती दीप्ति मैठाणी व वनस्पति विज्ञान की प्राध्यापिका डॉ0 श्रुति अग्रवाल आदि मौजूद रहे।

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