गजा (डी.पी. उनियाल): गढ़वाल की सांस्कृतिक चेतना, प्राकृतिक सौंदर्य, सामाजिक परिवेश और पहाड़ों से हो रहे पलायन की पीड़ा को गढ़वाली भाषा में पिरोने वाले प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली की नवीन काव्यकृति ‘बौडिक ऐजा’ (लौट के आ जाओ) का भव्य विमोचन किया गया। यह काव्यकृति उत्तराखंड के पहाड़ों की मिट्टी, संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़ने की एक भावपूर्ण पुकार है।
जन्मभूमि के कथा मंडप में हुआ भावपूर्ण विमोचन
डॉ. चमोली ने अपनी इस विशेष कृति को अपनी माँ और मातृभूमि को समर्पित किया है। एक बेहद भावपूर्ण और सुंदर संयोग यह रहा कि जिस काव्यकृति का शीर्षक ही अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करता है, उसका विमोचन डॉ. चमोली ने अपनी ही जन्मभूमि ग्राम पलाम में किया। पलाम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के शुभ अवसर पर कथा मंडप के भीतर, धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच इस पुस्तक का विमोचन संपन्न हुआ। इस समारोह ने साहित्य, संस्कृति, लोकजीवन और मातृभूमि के प्रति गहरे अनुराग का एक बेहद सुंदर संदेश समाज को दिया।
वर्तमान परिवेश में पलायन के दर्द को बयां करती प्रासंगिकता
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण आज अनेक गांवों की सामाजिक संरचना, पारंपरिक जीवन पद्धति और सांस्कृतिक निरंतरता पूरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण समय में डॉ. चमोली की यह कृति समाज के लिए विशेष प्रासंगिकता रखती है।
बता दें कि डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषा के निष्णात विद्वान, प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं शोधकर्ता हैं। वर्तमान में वे राजकीय इंटर कॉलेज खंडकरी (चम्बा, टिहरी गढ़वाल) में अंग्रेज़ी के प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं।
इस गरिमामयी विमोचन कार्यक्रम में आचार्य भरत किशोर, पुरुषोत्तम रणाकोटी, गणेश रतूड़ी, पीयूष भट्ट, आदित्य नौटियाल, श्रीमती अशरुपी चमोली, दिनेश कोठियाल, संजय चमोली सहित बड़ी संख्या में उनके परिजन और पलाम क्षेत्र के स्थानीय ग्रामीण उपस्थित रहे।



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