पत्रकारिता के स्तर पर वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी अरोड़ा का चिन्तनीय लेख……..

हंगामा ए पत्रकार

जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। अरे कहां पहुंचे कवि मलाई चा…. पहुंचे कवि।

पत्रकारों की चिल्लम चिल्ली मैं पत्रकारिता किस ओर अग्रसर है चिंतनीय है । पत्रकार निडर निष्पक्ष स्वाभिमानी और समाज को आईना दिखाने वाला तमगो से सुसज्जित होता है । वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप ने पत्रकारिता और पत्रकारों को भी बदल दिया है ।

पिछले कुछ वर्षों में या फिर यह कहे कि एक दशक में पत्रकारिता का स्वभाव ही बदल चुका है बेबाक पत्रकारिता एवं सच्चाई से रूबरू कराने वाली खबरें आज देखने में सुनने में पढ़ने में ना के बराबर है रिपीटेशन के दौर में खबरों का चीर हरण अपने अनुसार कर लेना ही पत्रकारिता का स्वरूप बन चुका है वैसे तो पत्रकारिता का एक मूल सिद्धांत है कि वह निष्पक्ष होकर शब्दों की भाषा में लोगों को सच्चाई से रूबरू कराएं।

आज पार्टियों के अनुसार पत्रकारों की छवि बनती जा रही है कांग्रेसी पत्रकार या फिर भाजपाई इत्यादि पत्रकार कहकर भी तुलनात्मक बात समाज में होने लगे है पत्रकार जोकि निष्पक्ष धारा होती है हजारों पैबंद लगा चुका हैं पत्रकारिता के मायने अब सिर्फ रसूखदारके बीच बैठना और अपने काम निकालना शायद यहीं तक सीमित रह गया है शासन-प्रशासन में पत्रकारों की चहलकदमी इस बात की ओर इशारा करती है क्या वह निष्पक्ष हो सकता है शहर से लेकर जिले तक और जिले से लेकर राज्य तक और राज्य से लेकर देश तक अपने अपने स्तर पर पत्रकार अपनी तरीके से पत्रकारिता को अंजाम देने लगे हैं साथियों उंगली उठाना मेरी मंशा नहीं है लेकिन वस्तु स्थिति यही अवगत कराती है कि बड़ा ब्रांड हो या छोटा ब्रांड सभी एक ही लाइन पर चल पड़े हैं आखिर पत्रकारिता का जुनून कहां गायब हो गया जो अपने आप में देखते ही बनता था आज पत्रकारिता के नाम पर सूचनाएं अग्रसारित करना और चाटुकारिता वाली पत्रकारिता सर्वोपरि हो गई है देश और समाज को आईना दिखाने वाली पत्रकारिता कहीं चाक-चौबंद गलियारों में खो गई है किसी मुद्दे पर सभी मीडिया एक खबर उस खबर में भी अपना फायदा ढूंढ लेती है

साथियों आज खबरों का वर्णन इस प्रकार होने लगा है जैसे कि खबर नहीं हम खुदा बन गए ब्रेकिंग बिग ब्रेकिंग तथा सनसनी पत्रकारिता आज के दौर में इतनी हावी हो चुकी है कि एक व्यक्ति की खबर को 24 घंटे तक जोड़ा जाता है इतना ही नहीं है उन खबरों को चलाया जाता है जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और ही होती है ।

ऐसा नहीं कि खबरों में जान नहीं होती लेकिन उसमें जो चटकारा लगाया जाता है वह कितना जायज है वह देखते ही बनता है खबरों का नजरिया मूतने से हगने तक पर फोकस हो चुका है राष्ट्रीय खबरें होती है कौनसी खोजी पत्रकारिता है सवाल उन पर भी जरूर बनता है ।

आज के दौर में एक सोशल मीडिया शब्द बहुत प्रचलित हो रहा है सोशल प्लेटफॉर्म ने तो पत्रकारिता की बैंड ही बजा दिया उसे पत्रकारिता के लिए किसी मदद की आवश्यकता नहीं होती सोशल मीडिया का मतलब समाज पत्रकारिता जिसमें समाज से जुड़ी समस्याएं एकदम नदारद रहती हैं अप्रत्यक्ष रूप में सेक्स से जुड़ी खबरें परोसी जाती हैं

पत्रकारिता वह कुंदन शब्द है जो जितना तपता है उतनी ही अच्छी खबर बाहर आती है आज थानों में रोज नित्य पत्रकारों की बढ़ती संख्या में चिंता अवश्य जाहिर कर दी है कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप और स्वभाव निश्चित ही आने वाले समय में नगण्य हो जाएगा नित नए कारनामे उस भीड़ से निकल कर आते हैं जिसको हम पत्रकार कहते हैं पत्रकारिता के लिए जिन मापदंडों की आवश्यकता होती है उन मापदंडों को कोई पूरा करने में सक्षम नहीं होता है इतना ही नहीं 1 महीने बाद ही वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में आ जाता है।

संगठन के नाम पर एक बहुत बड़ी भीड़ समाज में पत्रकारों की इकट्ठी हो गई है ऐसे अनेकों संगठन जिनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई आवश्यकता नहीं है और कोई उनका योगदान नहीं है फिर भी वह एक पत्रकार समूह बनाकर शासन प्रशासन में अपनी पहचान बनाने में लगे हुए हैं।

आज प्रतिष्ठित संस्थाएं भी जोकि पिछले दो या तीन दशकों से कार्यरत हैं पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने वाले पत्रकारों के हितों के संरक्षण के लिए बने थे वह भी आज इस दौड़ में अंधे हो चलें है।

पत्रकार होने के मायने क्या होते हैं यह शायद पत्रकार बनने के बाद इसकी आवश्यकता नहीं होती है अधूरी जानकारी अधूरा ज्ञान एक कुरूप पत्रकार को जन्म देता है जिसका परिणाम शहर में फैल रही भ्रष्टाचार रूपी गंदगी में हाथ धोने के साथ-साथ नहाने का भी प्रयास किया जाता है पत्रकारिता का स्वभाव और मूल रूप कहीं और छिप गया है आज हम पत्रकार होने की बड़े दम भरते हैं लेकिन समाज को पत्रकारिता के मंच से हमने क्या दिया अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है मोबाइल मीडिया के दौर में आज हम लिखने पढ़ने से बहुत दूर हो चुके हैं इतना ही नहीं हमें शब्दों का ज्ञान भी उतना नहीं है जितना पत्रकारिता के लिए आवश्यक होता है पत्रकार के पास शब्दों का भंडार होता है जिसके दम पर वह अपनी बात को शार्ट तरीके से सभी के बीच में प्रस्तुत करता है।

मोबाइल मीडिया ने बेशक आमूलचूल परिवर्तन ला दिया हो लेकिन फ़ूहड़ पत्रकारिता को भी जन्म दे दिया है ऐसे पत्रकार मुझे कहने में बिल्कुल भी गुरेज नहीं है जो कि आठवीं पास नहीं होते हुए भी और वह अपने को वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं तब अपने आप में शर्मिंदा होने की अनुभूति होती है।

पत्रकार एक समाज का वह आइना है जिसको देखकर दुनिया अपनी दशा और दिशा बदलती है लेकिन जब वह आइना ही भ्रमित हो तो उसकी ओर आकर्षित लोग अपने को कहा महसूस करेंगे यह तो वही पत्रकार बता सकते हैं जो अपने को वरिष्ठता की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं आज अनेकों विभागों में पत्रकारों की बढ़ती भीड़ को देखकर अधिकारी झल्लाने लगे हैं ऐसा नहीं है कि वह पत्रकारों के इज्जत नहीं करते लेकिन पत्रकारिता को आवरण बनाकर छदम पत्रकार अपने को पत्रकार होने का दावा करते हैं जबकि वस्तुस्थिति कुछ और ही निकलती है शहर में हजारों ऐसे अनैतिक कार्यों में लिप्त होते हैं जिनको देखकर स्वयं आत्मग्लानि होती है।  किसी घटना या खबर के लिए शब्द लिखने के लिए उनके पास होते नहीं है। आरटीआई से किसी को कैसे परेशान किया जा सकता है वहां उस पत्रकारिता का हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जाता है आज एक बार फिर इस सोशल प्लेटफॉर्म ने मीडिया को एक विस्तृत रूप दिया हो लेकिन लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल कर स्वयंभू पत्रकार बनने की होड़ भी लग चुकी है पत्रकार नए-नए आवरण में आपको देखने को मिल जाएंगे आखिर कौन है वह पत्रकार और क्यों है ? उस पत्रकार यह भी एक सवाल बनता है।

ऐसा लगता है पत्रकार होने की जो नियति और नियत होती है उसमें उसका कोई योगदान नहीं है आवश्यकता नहीं है समाज में अतिक्रमण कर अपने को पत्रकार का दम भरने वाले लोग शहर को और कुरूप करने में लगे हुए है

जिसका श्रेय उन पत्रकारों को भी जाता है जो कलम से अपनी दूरी बना चुके हैं या फिर मूकदर्शक बने हुए हैं  ।

 

चप्पे-चप्पे पर लोकल पत्रकार चैनल का पत्रकार अखबार का पत्रकार सोशल मीडिया का पत्रकार अपने को प्रचारित करते हुए गले में एक माला की तरह डाले हुए आई कार्ड से पूरे शहर को धमकाता फिरता पत्रकार जिम्मेदार क्यों है मौन ? जेहन में तैरता सवाल।